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तुम बहुत बोल-बोल करने लगे हो

तुम बहुत बोल-बोल करने लगे हो... जहां एक वाक्य से चल जाय वहां तीन तीन वाक्य बोलते हो। कभी तो एक ही वाक्य को बदल-बदल कर तीन बार बोलते हो। मौन का महत्व बाद में समझना। उपवास का महत्व समझने से पहले मिताहार का महत्व समझना पड़ेगा। मौन का महत्व समझने से पहेल मितभाषी बनने की प्रेक्टिस करनी पड़ेगी। तुमको ऐसा लगता है कि तुम जितना अधिक बोलेंगे उतना अधिक सुनेगें नहीं, यह गलत सोच है तुम्हारी। तुम सतत बोलते रहते हो इसलिए अब लोगों ने तुम्हे सुनना बंद कर दिया है। घर में बैठे-बैठे दादाजी को बाहर जा रहे परिवार के किसी व्यक्ति से दवाई मंगानी है। बेटा, तु वापस लौटते हुए मेरे लिए फला दवाई लेते आना। इतना कहने के बजाए दादाजी लंबा लंबा लेक्चर देते है। फला मेडिकल स्टोर में से नहीं बल्कि ढींकणा केमिस्ट की दुकान से लेकर आना। एक बार क्या हुआ उसने मुझे एक्सपायरी डेट के बाद वाली दवा दे दी। घर आकर मुझे पता लगा। मैंने वापस भेजी तो कहता है कि बिल लेकर आए। अब बिल तो उसने दिया ही नहीं। बिल बगैर माल बेचता है। सरेआम टैक्स चोरी करता है। ये मोदी कर क्या रहा है? कहलाता है इतना बडा प्रधानमंत्री लेकिन उसकी नाक के नीचे होने वाली टैक्स चोरी नहीं पकड़ सकता और स्विसबैंक से देश का काला धन लाने का बात करता है। इसके मुकाबले तो नेहरु का राज अच्छा था। हमारे जमाने में तो....
दादाजी, आपको ब्लड प्रेशन की टेब्लेट मंगाने में रस है या दूसरों का बीपी बढ़ाने में। यह कोई उन्हें मुंह पर नहीं कह सकता। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें सुनने वालों की संख्या घटती जाती है। ऐसा समय आएगा जब उनके सिनीयर सिटीजन्स ग्रुप में भी उनका कोई सुनने वाला नही होगा। इसलिए कम बोले। जहां तक हो मौन रहे। एक वाक्य से काम चलता हो वहां दो वाक्य भी नहीं बोले। ये बात मात्र दादाजी को ही लागू नहीं पड़ती बल्कि हम सभी के लिए है।

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