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प्रतिस्पर्धियों के प्रति रवैया

एक व्यापारी महीने एक हजार डिब्बा केरोसीन बेचता था। दूसरे की शक्ति दस हजार डिब्बे बेचने की थी। छोटे व्यापारी को लगा कि, चलो, मैं डिब्बे की कींमत पांच रूपए घटा दूं। तो मुझे पांच ही हजार का नुकसान होगा, लेकिन सामने वाले को भी इस भाव में बेचना पड़ेगा। ऐसे उसे पचास हजार का नुकसान देखना पड़ेगा। ये कोई अच्छी मनोदशा नहीं है। बल्कि, बड़े व्यापारी ने डिब्बे पर दस रूपए की कींमत घटा दी। इसके परिणाम स्वरुप छोटे व्यापारी को अधिक नुकसान होने की स्थिति पैदा हो जाए। स्पर्धा में कैसे भी रास्ते लेने वालों को ख्याल नहीं होता। वह तो ऐसा ही मानता है कि मुझे अपने में विश्वास है। इसलिए मैं ही जीतने वाला हूं। लेकिन वह यह भूल जाता है कि सामने वाला भी ऐसा सोच सकता है ! मैं मरू तो मरू लेकिन तुझे भी ले मरू। वह भी अंतिम दांव खेलने में अपना दिल का सही या गलत जोश निकाल देता है लेकिन इस जोश में माप के मामले में गलती कर जाने की पूरी-पूरी संभावना है।
आप अपने स्पर्धी को व्यक्तिगत दुश्मन कभी नहीं समझो। इस मुद्दे पर विचार करते हुए राजनेता जो स्पिरीट दिखाते है मैं उसकी कदर करता हूं। वह आमने-सामने लड़ते है, लेकिन हाथ मिलाते है और हंस-हंस कर एक-दूसरे का अभिवादन करते है ऐसे मानों कि जन्मों-जनम के मित्र ना हो !

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